मंगलवार, सितंबर 15, 2009

तुम से मिलता हूँ तुम सा हो जाता हूँ

तुम से मिलता हूँ तुम सा हो जाता हूँ..
तू मेरा फलसफा मैं तेरा किस्सा हो जाता हूँ..

हाल-ऐ-बयाँ ये तुम से कैसे करे " काफिर"..
तुम्हे जो देखता हूँ सब कुछ भूल जाता हूँ..

तेरी कमियों को हज़ार बार गिना है मैंने..
हर बार तेरी अच्छाइयों से हार जाता हूँ..

तुम मिलते हो तो चैन-ओ-सुकून है ज़िन्दगी में..
तुम्हारे जाते ही मशर में भी अकेला रह जाता हूँ..

तुम जब जाओगे तो हिज्र-ऐ-हालत का मज़मून यही होगा..
अब मुझसे जलेंगे कैसे लोग  तुम से ही तो दुनिया को जलाता हूँ...

और क्या चाहूं मैं तुम से क्या कहूं कर सको तो इतना करो..
मेरी यादों में तू बसे और मैं तेरी यादों में ठिकाना चाहता हूँ ..

रविवार, अगस्त 09, 2009

क्या बताये क्या है हम

क्या बताये क्या है हम..
तब भी गधे थे, अब भी गधे है हम..

लोग कहते है इकीसवी सदी है..
और, सत्रहवी सदी का सामान है हम..

आमद से हमारी भगदड़ यूँ होती है..
गोया हिरनों के झुंड में शेर है हम..

हिदायत है सब को, कम बोलो हमसे..
के गुफ्तगू में सलीके दार है हम..

इस तरह लोग साथ मेरा चाहते है..
बेईमान ना बनू पर, ईमानदार रहू कम..

ग़लतियाँ करना फितरत है में है "काफिर"..
क्या करे के हम दुनिया दार है कम..

शनिवार, अगस्त 08, 2009

किसे तलाश किया करते हो

किसे तलाश किया करते हो..
अकेले में क्या बात किया करते हो..

क्यूँ ये हालत ये माजरा क्या है..
सब है भीड़ में तुम ही तन्हा हुआ करते हों..

पुरानी सी शकल ये जो आईने में है..
रिश्ता अपना- उसका बस पूछा करते हों..

कभी यूँ भी हो के मिलो उससे..
जिसके साथ - साथ चला करते हो..

ढूंढोगे तो कोई मिल ही जाएगा..
घर का दरवाजा क्यूँ बंद रखा करते हो..

माना के सफ़र अकेले ही काट लोगे "काफिर"..
पर शायद किसी के साथ की  दुआ भी किया करते हो ..

सोमवार, जुलाई 27, 2009

तुझे क्या देखूं

फ़ुरसत नही हमें ख़ुद ही से..
एय अलम तुझे क्या देखूं ..

जो देख लिया इक बार उसे..
ये एहले -जहाँ क्या देखूं ..

समंदर एक बूँद में देख लिया है..
कतरा भर पानी का मश्क क्या देखूं..

आरजुए ले आई हैं इतनी दूर हमें ..
मुमकिन नहीं के अब मुड़कर देखूं ..

जी जो अब तक भरा ही नही "काफिर" उनसे..
गुंजाइश कहाँ के किसी और को देखूं ...

मंगलवार, जुलाई 14, 2009

जो तेरा सजदा न करू तो क्या करू

जो तेरा सजदा न करू तो क्या करू ..
तुझपर भी एतबार न करू तो क्या करू ..

आदमी को आदत है सर को झुकाने की ..
झुकने  को तेरा दर न मिले तो क्या करू ..

देखा कहा किसी ने तुझे  रवा होते..
और तेरी कैफियत से इनकार क्या करू..

मंजिल मिले न मिले सही..
मैं तो तेरी ही कश्ती का सवार क्या करू ..

काफिला -कारवां रास्ते कई है..
पर तेरी राह न मिले तो क्या करू ..

तुझे ढूंडा है तबसे मैं हूँ जबसे ..
रवायत सी हो गई है क्या करू..

गया जो दम तो गए हैं "काफिर" भी ..
जो था तुझसे ही दम तो क्या करूँ ..